“जब राम जी मिलिहैं तब हम उनका समझा देब" - वरिष्ठ पत्रकार शंभू नाथ की फेसबुक वॉल से


सुभाषिनी अली को मैं पाँच दशक से जानता हूँ। आज़ाद हिंद फ़ौज के कर्नल पीके सहगल और डॉक्टर लक्ष्मी सहगल की बेटी सुभाषिनी तब भी मज़दूरों के बीच जाकर काम करतीं, जब उनके पिता कानपुर की एक बहुत बड़ी मिल के डायरेक्टर थे, यानी मालिक। वे 1989 में कानपुर से लोकसभा सदस्य रही हैं और गरीब-गुरबों में खूब लोकप्रिय हैं। वे माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य भी हैं।
आज के अमर उजाला में उनका एक लेख छपा है- उस रामभक्त की याद! कानपुर के नौबस्ता इलाक़े में मुस्लिम आबादी हिंदुओं से घिरी है। छह दिसंबर बानबे को बाबरी मस्जिद गिरते ही दंगे शुरू हो गए। वहाँ पर आमिना नाम की एक मुस्लिम महिला रहती थी, जो सोशल वर्कर थी, बग़ल में एक धर्मनिष्ठ पंडित तिवारी जी रहते थे। आमिना और तिवारिन में दोस्ती थी, किंतु तिवारिन अपनी इस मुस्लिम सखी के घर पानी नहीं पीती थीं। दंगे के दौरान गुंडे जब आमिना को ढूँढ़ रहे थे, तब आमिना घर पर अकेली थीं। पति और बच्चे आज़मगढ़ गए हुए थे। तिवारिन पीछे से गईं और आमिना को अपने घर ले आईं तथा चौके में छुपा दिया। आमिना नहीं मिली तो दंगाइयों ने तिवारी से पूछा और कहा, कि घर की तलाशी लेंगे। दंगाई जब चौके की तरफ़ जाने लगे तो तिवारिन रास्ता छेक कर खड़ी हो गईं। बोलीं- कहाँ बैल अइस घुसे जात हो, वो चउका आय! दंगाई बोले- रामायण हाथ में लेकर क़सम खाव। तिवारिन ने क़सम खा ली। दंगाई चले गए और आमिना की जान बच गई।
सुभाषिनी जी ने जब एक दिन हंसते हुए तिवारिन से पूछा, कि तुम्हार धरम तो भ्रष्ट हुइ गवा, अउर तुम झूठी क़सम खा लिनहिउ? झूठ बोलिव? तो तिवारिन बोलीं, कि “जब राम जी मिलिहैं तब हम उनका समझा देब। उईं ज़रूर मान जइहैं।”